गुरुवार, 19 मार्च 2009

तरह तरह के गांधी


गांधी की गंध में सना हुआ देश है हमारा भारतवर्ष। करीब करीब पिछली एक सदी से यह गांधीमय है। गांधी इसकी पहचान है और गांधी ही इसकी जान है। बिना गांधी के यह देश तो नहीं, हां, देश की कुछ संस्थाएं मरी मरी सी लगती हैं। अब अपनी कांग्रेस को ही लो। जबसे है तबसे गांधी की धोती पकड़े है। धोती मर्दानी से जनानी हो गई पर कांग्रेस ने गांधी की धोती नहीं छोड़ी। धोती पाजामें में तब्दील हो गई तो कांग्रेस ने पाजामे का पांवचा पकड़ लिया। गांधी के प्रति सर्वथा समर्पित है कांग्रेस।
और सिर्फ कांग्रेस ही क्‍यों, आजकल तो भाजपा भी गांधी को गोद में लिए घूम रही है। सत्ता में आई तो गांधीपूजन शुरू कर दिया। मक़तूल की तस्वीर पर हारफूल चढ़ाकर कातिलों की पीढि़यों ने श्रद्धांजलि दी और पाक़साफ हो गए। संतमना गांधी ने अपना क़त्ल भी माफ़ कर दिया और हिन्दुत्व के ठेकेदारों के मजे़ हो गए।
भाजपावाले भी यह तथ्य मान चुके है कि गांधी इस देश का प्रतिपल-चर्चित-व्यक्तित्व है। गांधी के बगैर और कुछ भले हो जाए पर इस देश में राजनीति नहीं हो सकती है। देश की आधी राजनीति गांधी के पक्ष में है और आधी उसके विरोध में। हर बात गांधी से शुरू होकर गांधी पर ही समाप्त होती है। गांधीचर्चा और गांधी देश के लिये अपरिहार्य हैं।
पर लाठी-लंगोटीवाला गांधी तो अब गुज़र गया है। अब वह सिर्फ दफ्तरी दीवारों या गांधीमाला जपनेवालों की दीवारों पर ही है चित्रों की शक्ल में। किताबों में है शब्दों की शक्ल में। रूप बदले हुए बैठा है दंद-फंदी राजनेताओं की कूटनीतिक अक्ल में। अब तो देश में गांधी के कुछ नए संस्करण हैं। पुरानेवाले को तो नई पीढि़यां जानती तक नहीं। हाईस्कूल इण्टर की परीक्षाओं में इंदिरा गांधी को महात्मा गांधी की बहूबेटी बताने का युग है यह।
महात्मा के बाद गांधी नाम से इस देश ने जाना इंदिराकांत फीरोज़ को। वे भी गांधी थे। इस देश को मिले गांधी नंबर दो। वह भलामानस देश के प्रथम प्रधानमंत्री का, नेहरू का दामाद था, पर इस रूप में अपनी पहचान नहीं चाहता था। वह अलग-थलग व्यक्तित्व का धनी था और नेहरू नाम में उसकी कोई ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। नतीजा जो होना था वही हुआ। वक्त की आंधी ने उसके नाम के ‘गांधी’ शब्द को छोड़कर सब कुछ उड़ा दिया।
उस गांधी नाम को जवाहरसुता ने अपने नाम के साथ जोड़ा तो सही, पर वे नेहरू भी बनीं रहीं। बहरहाल वे थीं देश की नम्बर तीन गांधी। गांधी-नेहरू शब्दों का चमत्कार था कि वे बरसों शिखरवासिनी रहीं। कांग्रेस ने उनका पल्लू ऐसा थामा कि कांग्रेस ‘आई’ तो उनकी वजह से और ‘गई’ तो उनकी वजह से।
जवाहरसुता के अपने सुत संजय देश के चौथे गांधी थे जो भारतीय राजनीति पर धूमकेतु बनकर आए, छाए और फिर अचानक एक दिन आकाश उन्हें लील गया। रह जाते तो राजनीति की शक्ल कुछ और होती। उनके बाद संजयप्रिया मेनका संपादक, पशुरक्षक और राजनेता बनकर उभरीं। ये थीं गांधी नंबर पांच। पर उनकी पटरी अपनी सासूमां से नहीं बैठी। नतीजतन गांधी नंबर तीन ने गांधी नंबर पांच को घरनिकाला दे दिया और देश को गांधी नंबर छह थमा दिया। गांधी नंबर छह आकाश में उड़ने वाले ज्येष्ठ इंदिरासुत थे। उन्हें वायुयान छोड़कर धरती पर आना पड़ा। वे आए तो अनमने अनचाहे पर गद्दी उनका इंतजार कर रही थी सो आकर कांग्रेस को तार गए और खुद को देश पर वार गए।
इस बीच गांधी नंबर सात के रूप में देश ने इटली से पधारीं राजीवप्रिया को पहचाना। वे भी बरसों के अज्ञातवास के बाद कांग्रेस को पुचकारने दुलराने लाईं गईं। वे भी चूंकि गांधी थीं सो, आईं और कांग्रेस पर तथा उसके रास्ते देश पर छा गईं। देशी-विदेशी की रार में बेचारी सिंहासन से अब तक तो दूर ही हैं पर उनकी संतति में अलबत्ता देश को इंदिरा-प्रियदर्शिनी दिखाई जाने लगीं। प्रियदर्शिनी प्रियंका राजनीति में उतरतीं उससे पहले वे वढेरा को दिल में उतार बैठीं। आज वे आठवीं गांधी हैं पर दादी की तर्ज़ पर प्रियंका गांधी वढेरा हैं।

उन्हींके लाडले भैया हैं संभावनाओं से भरे गांधी नंबर नौ यानी अपने राहुलबाबा। यही अब कांग्रेस का भविष्य हैं। इनके बाद आते हैं गांधी नंबर दस यानी मेनकासुत वरुणबाबा। इन दिनों इसी दस नंबर गांधी के चर्चेआम हैं।
गांधी नाम के बोलबाले से घबराई भाजपा ने सासपीडि़ता मेनका के लाडले को गले लगाया है। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। इसी सिद्धांत ने काम किया है। पीलीभीत से वरुण गांधी भाजपा के उम्मीदवार बने और उन्होंने आते ही आरएसएस ही बाळ ठाकरे तक को खुश कर दिया। धर्मनिरपेक्षों के घर से धर्मसापेक्ष नेता चुरा लिया भाजपा ने। वरुण ऐसे उमड़े, ऐसे गरजे, ऐसे बरसे कि भाजपा को ही पसीने आ गए। वरुण की भाषणी बाढ़ में भाजपा की नाव हिचकोले खा रही है। चुनाव आयोग की कीलें उस नाव में छेद किये जा रही हैं। बहरहाल देश तो इतना ही समझ पाया है कि वह गांधी है और उसे गांधी बनकर ही रहना है। अब वह गांधी भले इधर का गांधी हो या उधर का।