शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

माया की माया

संत कबीरदास शताब्दियों पहले कह गए थे  कि ''माया महाठगिनि हम जानी''। इस 'हम' में वे खुद  और उनके कुछेक समकालीन संत रहे होंगे जिन्‍होंने माया के असली रूप को समझ लिया। पर हम  दुनियावालों की समझ में यह बात  तब क्‍या, अब तक भी नहीं आई हैजबकि माया साक्षात विचरण कर रही है हमारे बीच। और तो और इस घोर कलिकाल में खुद संतगण ही माया की ठगी के शिकार हो रहे हैं।

माया हर काल में, हर युग में और हर जगह महत्‍वपूर्ण रही है। माया को ठगिनी कहकर भी गले लगाने का घनघोर चलन हमेशा रहा है।  माया से दूर रहो कहने वाले संत-महंत अपने भक्‍तों को माया से दूर रहने का उपदेश देकर उनकी माया को अपने मठ, मंदिर, आश्रम अखाड़ों में संचित करने के हामी हैं। उनकी कृपा से उनके भक्‍त माया के ''प्रकोप'' से बच जाते हैं और संतगण उनका सारा दर्द अपने जिगर में समेट लेते हें। ये संत गंगा मैया की तरह परोपकारी संत हैं। गंगा मैया भक्‍तों को पापमुक्‍त करती है और ये संतगण माया को भक्‍तों के निकट नहीं रहने देते। मायावी आफतों को खुद ओढ़कर भक्‍तों को उससे मुक्‍त कर देते हैं। कुलमिलाकर  जैसे पापहारिणी गंगा भक्‍तों के पाप स्‍वयं बहाकर उन्‍हें पापमुक्‍त कर देती है, वैसे ही आधुनिक संतगण ठगिनी माया को अपने वश में करने की अपनी मायावी कला से अपने भक्‍तों को ''लाभान्वित'' करते ही रहते हैं।

लेकिन माया तो माया है। वह संतों को और उनके भक्‍तों, दोनों को ही, ठगती रहती है। वह दोनों को सत्‍ता के गलियारों में पहुंचाने में भी कामयाब हो चुकी है। वह खुद सत्‍ताधारिणी है। वह सर्वशक्तिमान है, सर्वत्र है, सार्वकालिक है, सार्वभौमिक है। अंग्रेजी में कहें तो ओम्‍नीप्रेजेंट और ओम्‍नीपोटेंट ही नहीं ओम्‍नीवोरस भी है। सबको चट कर जाने की ताकत रखती है, यह सर्वसिद्ध है और यह ताकत वह अक्‍सर दिखाती भी रहती है। आजकल  लखनऊ में बैठकर दिखा रही है। विधायिका और कार्यपालिका को चट करने के बाद वह अब न्‍यायपालिका को चट करने की फि़राक में है। देवी का यह कुमारिका रूप कलिकाल  में साक्षात है। हम धन्‍य हैं जो म‍हामाया को साक्षात देख-सुन पा रहे हैं।

अब अपनेराम तो पैदा ही मायापुरी में हुए हैं। गंगा किनारे वाली मायापुरी में। सो माया के झटके औरों की तुलना में कुछ ज्यादा ही लिखे हैं अपनी किस्‍मत में। संतों वाली मायापुरी से लेकर ठाकरेवाली मायानगरी तक माया के अनेकानेक रूप देखे हैं अपनेराम ने। पर जो लटके-झटके लखनऊ वाली माया के देखे वे अद्भुत और अपूर्व हैं। माया का ये चिरकुमारी रूप है। मांग भले न भरी गई हो पर मांगें तो दिनरात सामने आती रहती हैं। अब वे दिन तो हवा हुए जब 'अयोध्‍या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवंतिका। पुरी द्वारावतीश्‍चैव सप्‍तैता मोक्षदायिका।' कहकर माया के पुरीरूप को सम्‍मान दिया जाता था। अब तो जीवित देवी के मूर्तिमंदिरों की प्राणप्रतिष्‍ष्‍ठा का कलिकाल है। इस प्राणप्रतिष्‍ठा में अगर लोकतंत्र की न्‍यायदेवी भी आड़े आई तो उसे भी दरकिनार कर दिया जाएगा। माया के आगे न्‍याय क्‍या बेचता है भला।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

सोने के तारों की खादी

हमारे राष्‍ट्रपिता और राष्‍ट्रपति दोनों ही इन दिनों सुर्खियों में हैं। सारी दुनिया में अपने राष्‍ट्रपिता अतिविशेष हैं। उनका सुर्खियों में रहना तो सामान्‍य बात है। पर अपनी राष्‍ट्रपति का इन दिनों सुर्खियों में रहना विशेष हैं। राष्‍ट्रपिता अगर एक कलम की वजह से चर्चित हो रहे हैं तो राष्‍ट्रपति इन दिनों अपने पुत्र के कारण चर्चा में हैं। पुत्र के कारण लोगों का चर्चा में आना समाज का दस्‍तूर भी है। राष्‍ट्रपति भला क्‍यों अछूती रहें।
पहले अपने राष्‍ट्रपिता की ही चर्चा करें। जिन ब्रिटेन वालें अंग्रेजों के खिलाफ राष्‍ट्रपिता सारी उमर लड़ते रहे, उन्‍हीं की बनिया औलादों ने हमारे राष्‍ट्रपिता के यश को भुनाने की मुहिम शुरू की है। 1930 में हुई बापू की प्रसिद्ध 241 मील की दाण्‍डी यात्रा की याद में भाईलोगों ने चांदी-सोने का एक पैन बनाया है जिसकी कीमत रखी गई है डेढ् लाख से लेकर चौदह लाख रुपए तक। यानी ग़रीबों के लिये कमसे कम कीमत होगी डेढ़ लाख और अमीरों के लिये अधिकाधिक चौदह लाख। प्रसिद्ध ‘मों ब्‍लां’ कंपनी द्वारा बनाए गए इस पैन पर दाण्‍डी कूच पर निकले, हाथ में डण्डा लिये बापू की स्‍वर्णाकृति बनी है। सोने के तारों से जड़ी-मढ़ी इस कलम पर की निब भी सोने की है। इस पर जब आप हाथ फेरेंगे तो, बताया जा रहा है कि, खादी पर हाथ फेरने जैसा अहसास होगा। बेशर्मी की पराकाष्‍ठा भी है खादी का यह अपमान। बापू आज होते तो यह सब सुनकर माथा पीट लेते या ग़श खाकर गिर पड़ते। उनकी सादगी का यह मज़ाक है। इसके खिलाफ उन्‍हें एक नया आन्‍दोलन,या एक नई दाण्‍डीयात्रा निकालनी पड़ जाती। पर उनके अनुयायियों का यह देश चुप है। यह तो संभव है कोई शराब निर्माता दस-बीस गांधी कलमें खरीदकर सुर्खियों में आ जाए। बस इतना ही होना है आगे।
इस पैन पर लिखा है ‘महात्‍मा गांधी लिमिटेड एडीशन 241’ और ‘महात्‍मा गांधी लिमिटेड एडीशन 3000’। पैनपहले पपैन पूर्ण स्‍वर्ण के हैं जबकिदूसरे वाले चांदी-सोने के हैं और पैन के साथ रोलर भी हैं। संख्‍या में कुल मिलाकर ये छह हज़ार पैन विश्‍वभर के बाज्रों में बेचे जाएंगे। गरीब देश के अधनंगे रहने वाले फकीर नेता को दी जा रही यह विडम्‍बनाभरी महंगी श्रद्धांजलि कोई घाघ बनिया ही दे सकता है। यह वही बनिया है जिसने अपने व्‍व्‍यापार की आड़ में देश को दशकों तक अपने कब्‍जे में रखा। अब जिस बूढ़े ने उस बनिये को अपनी लाठी से हंकालकर बाहर किया वह बेशरम बनिया उस बूढ़े की उसी लाठी को फिर से व्‍यापार का माध्‍यम बना रहा है। अजब दुनिया है। जो सादगीभरा जीवन बापू ने जिया उसकी ठाठबाट वाली परिणति इस तरह होते देख रहे हैं हम कि कागज के दोनों तरफ लिखने वाले बापू, डाक में आई आलपिनों तक को संभालकर रखने वाले बापू, की यादों को अब वही बनिया सोने में ढालकर बेच रहा है और हम चुपचाप टुकुर टुकुर देख रहे हैं।
अब राष्‍ट्रपति की बात करें। उनका बेटा अमरावती से विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रत्‍याशी है। इस देश में किसी का भी बेटा चुनाव लड़ सकता है। राष्‍ट्रपति का लड़ रहा है तो लड़े । पर निष्‍पक्ष दीखने की चाहत में बेटे के दल के ही अमरावती के मेयर ने अजब मांग कर दी है। उनका कहना है कि अमरावती के सभी सरकारी दफ्तरों से राष्‍ट्रपति जी के चित्र हटा दिए जाएं या उन चित्रों पर कपड़ा डालकर उन्‍हें ढक दिया जाए। क्‍यों भाई क्‍यों। ऐसा क्‍यों करना है। तो बड़ा मासूम सा कारण बताया है मेयर साहब ने कि ऐसा न किया गया तो वोटर प्रभावित हो जाएंगे जो लोकतंत्र के खिलाफ है।
क्‍या तर्क है, क्‍या मासूमियत है, कुर्बान जाने को मन हो आया है मेयर साहब पर। अमरावती जिले के दफ्तरों से महामहिम के चित्र हटते ही मानों सच्‍चा लोकतंत्र आ जाएगा, सारे मतदाता भूल जाएंगे कि राजेन्‍द्र शेखावत महाहिम के पुत्र हैं और राष्‍ट्रपति जी के चित्रों पर पर्दा पड़ते ही मतमदाताओं क याददाश्‍त और प्रत्‍याशी की वल्दियत पर भी पर्दा पड़ जाएगा। ये सब हो या न हो, अपनेराम को तो फिलहाल मेयर साहब के दिमाग़ पर ही पर्दा पड़ा नज़र आ रहा है ।

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

बीबी चाहिये तो वोट दो

चुनावों में किये जाने वाले वादो से सारा देश परिचित है। तरह तरह के उम्‍मीदवार तरह तरह के वादे करते नज़र आते हैं। कोई मकान का वादा करता है तो कोई बिजली का। कोई सड़कों की बात करता है तो कोई साफ पानी का वादा करता है। वोटर इन वादों पर यकीन करके  उम्‍मीदवार को जिताता है और फिर पांच बरस टापता रहता है यह सारा देश जानता है। पर इस बार दावे भी नए हैं और वादे भी। अगर कुंवारों को बीबियां चाहिए तो वोट देना होगा। यह खबर अपने हरयाणे से आई है।  खबर बिलकुल पक्‍की है। वहां इन दिनों आम चुनावों का माहौल है। नाम ही हैं आम चुनावों का वरना सच तो यह है कि हरयाणे के चुनाव तो हमेशा ही खास होते हैं। इस बार की खासियत छनकर ये आई कि कई इलाकों में प्रत्‍याशीगण कुंवारों को लड़कियां दिलवाने के वादे कर रहे हैं। बेटों के मां-बाप खुश हैं। उन्‍हें अब यकीन है कि उनके घर बहू आ जाएगी। भाभी की इन्‍तज़ार करने वाले देवरगण और ननन्‍दों की जमातों में हर्ष  है। और दूल्‍हे तो भयंकर प्रसन्‍न हैं। उनके घर बसने को हैं।

यह देश सचमुच विविध भारती है। विविधता भी यहां की विरोधाभासी है। एक तरफ नारी मुक्ति की हलचलें और दू‍सरी ओर समाज को नारी से ही मुक्‍त करने के षड्यंत्र। अजब विविधता है इस विविध भारती में। यह विविधता ही इसे तारती है और यही विविधता ही इसे मारती है। यह देश जिस काम को हाथ में लेता है उसे पूरा करके छोड़ता है। अब इक्‍कीसवीं सदी में यह अजब विरोधाभास इसी देश में संभव है कि लोग बेटियां न पैदा होने दें और बीबीयों के तलाश में उनके बेटे अपने वोट बेचने को मजबूर हों ।

इन दिनों एक चैनल पर हरयाणे की एक अम्‍माजी छाई हुई हैं। अम्‍माजी हैं तो खुद भी औरत ही पर अपने गांव बीरपुर की औरतों और लड़कियों के सख्‍त खिलाफ़ हैं। इस बात का पूरा ध्‍यान रखती हैं कि कोई छोरी पैदा ना ना जाए उनके गांव में। यहां तक उनकी देवरानी की लड़की झूमर भी उनके घर में इसलिये पल-बढ़ गई कि उसे बाहर गांव से आई नौकरानी की बेटी बताया गया।

तो भाईलोगों, ऐसे हरयाणे से समाचार कुछ ये आरहे हैं कि वहां अब छोरियों का टोटा पड़ गया है। छोरे ज्‍यादा हो गए हैं और छोरियां समाज से नदारद होती जा रही हैं। ये मामला अब चुनावी मुद्दा बन गया है। अब वहां के कुंवारे कुलदीपक चुनावी उम्‍मीदवारों से रोटी, कपड़ा या मकान, बिजली, सड़क, पानी की जगह लड़कियां मांग रहे हैं। वे बेचारे करें भी क्‍या। घर ही नहीं बसेगा तो बाकी चीजों का क्‍या करेंगे। घरवाली के बगैर घर का क्‍या मतलब। सरकार गेहूं-चावल का जुगाड़ कर भी दे तो  क्‍या। रोटी पकाने वाली ही न मिले तो जि़न्‍दगी बेकार है। मुश्किल यह भी है कि अगर जात बाहर की छोरी पसंद आ जावे तो गांवों की, बिरादरी की पंचायतें बवाल कर दें। जीने ना दें छोरे-छोरियों को।  अब तो एक ही लोकतांत्रिक रास्‍ता बचा है नई पीढ़ी के सामने। छोरी दिलाओ वोट ले जाओ। ये मुहिम दोनों तरफ से जोर से चल रही है। उम्‍मीदवार कह रहे हैं वोट दो तो छोरी दिलाएंगे। वोटर कह रहे हैं छोरी दिलाओ तो वोट ले जाओ।