शुक्रवार, ६ नवम्बर २००९

आज वाणी अवाक् है

कई बरस बीत गए, शायद अस्‍सी के दशक की बात है। हरिद्वार कला साहित्‍य प्रसारिका संस्‍था ''वाणी'' ने तब व्‍याकरणाचार्य पं.किशोरीदास वाजपेयी की स्‍मृति में व्‍याख्‍यानमाला का आयोजन किया था। नवभारत टाइम्‍स के तत्‍कालीन प्रधान संपादक पत्रकार-प्रवर राजेन्‍द्र माथुर मुख्‍य वक्‍ता थे और जनसत्‍ता के संपादक प्रखर पत्रकार प्रभाष जोशी उस कार्यक्रम में अध्‍यक्ष की हैसियत से शामिल हुए थे। दोनों परस्‍पर प्रगाढ़ मैत्री की डोर में बंधे थे और दोनों ने ही अपनी पत्रकारिता इंदौर में एक ही बिन्‍दु से शुरू करके दिल्‍ली की मंजिल गांठी थी।

उस कार्यक्रम में तब प्रभाष जी ने अपने अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य की शुरुआत में कहा था कि, ''जिन रज्‍जू भैया की अध्‍यक्षता में मैंने पत्रकारिता की शुरुआत की थी आज उन्‍हीं के भाषण में मुझे अध्‍यक्ष बनाकर बिठा दिया गया है। यह स्थिति मुझे संकोच में भी डाल रही है और गुदगुदा भी रही है।''

प्रभाष जी का ऐसा कहना जहां उनकी सूफियाना वाणी और लेखनी का परिचायक था वहीं रज्‍जूभैया से उनके पारस्‍परिक आदरपूर्ण  मैत्री संबंधों की ऊष्‍मा को भी उजागर कर रहा था। मेरे लिए तो वे क्षण जीवनभर की पूंजी बन गए थे जब हिन्‍दी पत्रकारिता के इन दोनों दिग्‍गजों ने एक साथ मेरे घर की रसोई को पवित्र किया था। आज रज्‍जूभैया भी नहीं हैं और पं.प्रभाष जोशी भी हिन्‍दी पत्रकारिता को बिलखता छोड़कर चल निकले हैं अपने मित्र से मिलने। देश की स्‍वतंत्रता के बाद की हिन्‍दी पत्रकारिता अपना एक और पुरोधा खो चुकी है। पत्रकारिता सदमें में है, उसकी वाणी आज अवाक् है।

प्रभाष जी हिन्‍दी पत्रकारिता के एक पूरे युग की अलग पहचान थे। वे सही मायनों में चिंतक और विचारक पत्रकार थे जिनके संपादन में जनसत्‍ता ने हिन्‍दी को सर्वथा एक नई भाषा शैली और प्रस्‍तुतिकरण की अपूर्व धज प्रदान की। विभिन्‍न विषयों पर अपनी खांटी सोच रखनेवाले प्रभाष जी यूं तो परिवेश के सारे विषयों के प्रति जागरूक थे पर क्रिकेट उनकी जान थी। यह कहना भी शायद अतिशयोक्तिपूर्ण न माना जाए कि उनकी असामयिक मृत्‍यु का, उनके हृदयाघात का कारण भी यही क्रिकेट बनी।

जिस तरह की सूचनाएं मिलीं हैं यह क्रिकेट का दीवाना लिक्‍खाड़ पत्रकार कल रात सचिन तेंदुलकर की 17000 रनों की उपलब्धि पर विभोर था। प्रसन्‍नता और गर्व उनके वाणी और व्‍यवहार से छलक रहा था। पर अचानक देर रात को जब उन्‍हें समाचार मिला कि कंगारुओं ने भारत को सिर्फ तीन रनों से मात दे दी तो प्रभाष जी अवाक् रह गए। उन्‍हें भारत की इस हार से गहरा आघात लगा और समाचार मिलने के पन्‍द्रह मिनिट में ही उन्‍हें दिल का दौरा पड़ गया। उन्‍हें जब तक डॉटर की देखरेख में ले जाया गया तब तक तो वे लम्‍बी, बहुत लम्‍बी यात्रा पर निकल चुके थे।

प्रभाष जी का जाना हिन्‍दी पत्रकारिता के साथ साथ उनके उन हज़ारों मित्रों-परिचितों की व्‍यक्तिगत क्षति है जिन्‍होंने उनकी कार्यशैली देखी है और उनके विचार-सरोवर में अवगाहन कर उसमें समय समय पर खिले अनगिन कमलों का नैकट्य हासिल किया है। प्रभाष जी बेहद खुले व्‍यवहार वाले पारिवारिक किस्‍म के रचनाकार थे। वे कभी वायवीय चिंतक नहीं बने। उनकी भाषा में घरेलूपन था और विचारों में आत्‍मीयता थी। उनकी भाषा और विचार दोनों ही पाठक को अपने अपने से और बहुत करीब के लगते थे। राजकमल प्रकाशन ने ''लिखि कागद कारे किए'' श्रृंखला के 2000 से अधिक पृष्‍ठों वाले जो पांच खण्‍ड प्रकाशित किए हैं उनमें करीब चार सौ निबंघनुमा टिप्‍पणियों में पत्रकार प्रभाष जोशी की दृष्टि और सृष्टि का मणिकांचन संयोग उपस्थित हुबा है। प्रभाष जी की सोच को समझने के लिए इन चार सौ रचनाओं के बीच से गुज़रना काफी होगा।

हरिद्वार और गंगा से प्रभाष जी को बड़ा लगाव था। ''धन्‍न नरबदा मैया हो'' कहने  लिखने वाला यह कलमशिल्‍पी अक्‍सर हरिद्वार के गंगातट पर दिखाई पड़ जाता था। यह और बात है कि इस तरह की गंगायात्राओं के पीछे हमारी उषा भाभी की मंशा और प्रेरणा अधिक हुआ करती थी। पर यूं भी पंडित प्रभाष जोशी हरिद्वार आने या हरिद्वारियों से मेल-मुलाकात का कोई मौका छोड़ते नहीं थे। गुरुकुल कांगड़ी विश्‍वविद्यालय में हिन्‍दी पत्रकारिता पाठ्यक्रम की नींव 1991 में  उनके ही आशीर्वाद वक्‍तव्‍य से पड़ी थी। अनेक ऐसे  अवसर स्‍म़तिपटल पर हैं जब वे आए और अपनी वाचा से हमें धन्‍य करके लौट गए। उनकी यात्रा स्‍मृतियां हमें स्‍फूर्ति देती रहीं। पर अब हाथ-पांव फूल रहे हैं। पता नहीं उनके परिजन उन्‍हें किस तरह हरिद्वार लाएंगे। जिस तरह लाएंगे उसकी कल्‍पना तक सिहरा रही है। पंडित प्रभाष जोशी यायावर थे, घुमक्‍कड थे, मनमौजी थे । उनका अचानक हरिद्वार आना चौंकाता नहीं था। पर अब यह सोच सोच कर मन व्‍याकुल है वे कि क्‍या सचमुच रज्‍जूभैया की ही तरह उनके अस्थि-अवशेषों के गंगाविसर्जन का साक्षी हमें बनना होगा। हिन्‍दी पत्रकारिता में जमीनी जुड़ाव, सांस्‍कृतिक चेतना और बेलाग प्रखरता की चर्चा अब किस नाम से शुरू हुआ करेगी।

 

शुक्रवार, ३० अक्तूबर २००९

कुम्‍भ के शुम्‍भ-निशुम्‍भ

उत्‍तराखंड को लोग उसकी प्राकृतिक सुन्‍दरता के चलते धरती का स्‍वर्ग कहते हैं लेकिन इसी नाते से उत्‍तराखंड के निवासियों को स्‍वर्गवासी कहने का कोई रिवाज़ नहीं है। हां, इस प्रदेश का प्रमुख नगर हरिद्वार अलबत्‍ता कई तरह के ''द्वार'' के रूप में मशहूर है। देवभूमि की सीमा पर होने के कारण यह स्‍वर्गद्वार ज़रूर कहलाता है। यह महादेव यानी हर का द्वार है और विष्‍णु यानी हरि का भी द्वार है। अपनेराम का खटोला इसी दरवाजे पर पड़ा है। इसी दरवाज़े पर द्वाराचार के लिए द्वारपाल बने बैठे हैं अपनेराम। आजकल इसी द्वार पर बड़ी चहल पहल है। महाकुम्‍भ जो आने को है।

कुम्‍भ यानी घड़ा। हण्‍डा कह लो, कलश कह लो, कलसा कह लो । पर हर बारह बरस में यह घड़ा हरिद्वार आता है। बहुत बड़ा घड़ा बनकर आता है जिसे महाकुम्‍भ कहते हैं और इस महाकुम्‍भ के साथ ही यहां आते हैं देश-विदेश से लाखों-लाख श्रद्धालु तीर्थयात्री जिन्‍हें तलाश रहती है घड़े से गिरे अमृतकणों की। इसी तलाश में हरिद्वार पहुंचते हें ये सभी तीर्थयात्री।

2010 की शुरुआत यानी जनवरी से अप्रैल तक अपनेराम की छोटी सी कुम्‍भनगरी हरिद्वार में इन्‍हीं अमृत चाहने वालों की चहल-पहल ही नहीं रेल-पेल और उससे भी आगे की कहें तो धका-पेल भी बढ़ जाएगी। हर एक की कोशिश रहेगी कि अमृत की बूंद बस, उसीके हलक में उतरे।

लेकिन अमृत का घड़ा तो सही मायनों में हरिद्वार पहुंच चुका है। देवताओं का तो पता नहीं पर कुम्‍भ के शुम्‍भ निशुम्‍भ ज़रूर इस घड़े से अपने अपने गिलास भरने में जुट गए हैं। हर बार ऐसा होता है। पिछली बार खाली हो चचुके घड़े को सरकार फिर से अपना कोष देकर भरती है और अपने शुम्‍भ-निशुम्‍भों की नियुक्ति करके उसे खाली करने के रास्‍ते भी खोल देती है।
शुम्‍भ सरकारी होते हैं और निशुम्‍भ गैर-सरकारी। शुम्‍भ अधिकारी होते हैं और निशुम्‍भ उनके चहेते ठेकेदार। सरकारी और गैर-सरकारी दोनों मिलकर काफी असरकारी हो जाते हैं। ये दोनों प्रकार के असरकारी मिलकर महाकुम्‍भ जनपर्व को धनपर्व में तब्‍दील कर देते हैं। साढ़े पांच सौ करोड़ रुपयों से भरा है इस बार के महापर्व का घड़ा। जो हो रहा है करोड़ों में हो रहा है। अब इस घड़े को तीर्थयात्रियों के आने से पहले खाली करने की बड़ी जि़म्‍मेदारी शुम्‍भ निशुम्‍भों पर आ पड़ी है। इस घड़े का धन खाली होगा तभी तो इसमें आस्‍था और विश्‍वास का अमृत भरेंगे कुम्‍भ के ये असरकारी आयोजक। फिलहाल धन-कुम्‍भ खाली किया जा रहा है, जिन्‍हें अपना मन-कुम्‍भ भरना है वे अपनी जेबें भरकर कुम्‍भ नहाने आएं।

शुक्रवार, २३ अक्तूबर २००९

बिगबॉस का सीटी संपादन

इन दिनों लोग बीबी के घर में घुसकर वहां के जलवों का आनन्‍द ले रहे हैं। बीबी का घर चर्चा का विषय है। वहां की रंगीनियां रंग पर यानी अपने कलर चैनल पर गिखरी पड़ी हैं। सुबह से देर रात तक तक इस चैनल पर रंग ही रंग हैं। अनदेखा बिहार है, पता नहीं कौनसा राजस्‍थान है और मराठियों से छिपा हुआ महाराष्‍ट्र है। और है कथित कन्‍या विरोधी हरियाणा जहां के आईएएस तक औरतखोर हैं। इस चैनल के अधिकांश धारावाहिकों में देश के प्रांतों के जो चित्र दिखाए जा रहे हैं वे वहां के विकास के चित्र हैं या पिछड़ेपन के, यह बात शायद निर्मातागण धारावाहिकों के अंतिम एपीसोड्स में ही बताएंगे। तब तक अपनेराम की समझदारी पर ही टिके हैं इन धारावाहिकों के संदेश।

बहरहाल, जो समझ में आ रहा है वह है जि़दा धारावाहिक 'बीबी' यानी 'बिग बॉस' और 'बिग बॉस का घर'। इसमें सब कुछ बिग बिग यानी बड़ा बड़ा है। इसके प्रस्‍तोता तो सबसे ही बड़े हैं। खुद ही एक ज़माने से बिग बी के रूप में विख्‍यात हैं। कद-काठी से बड़े, आचार-विचार से बड़े, और तो और स्‍वभाव-प्रभाव से भी बड़े हैं। जिसके साथ जुड़ते हैं उसीको बड़ा  बना देते हैं। जैसे जैसे उम्र बढ़ रही है उनका आभामण्‍डल ‍भी बढ़ रहा है। एक बार वे लोगों को करोड़पति बनाने के लिए जुटे तो लोग बने हुए करोड़पतियों को भूल गए, पर याद रह गए बिग बी। अब वे बिग बी के घर में लोगों को रख रहे हैं तो भी लोग वहां रहनेवालों की भले थू थू करें पर बिग बी के कारण कलर की टीआरपी तो रंगीन से रंगीनतर होती जा रही है।

लेकिन इस बार बिग बी बिग बॉस से शिकायत हो सकती है कि बीबी के घर के सदस्‍य छांटने में कमी रह गई है। छांटने की इस कमी के चलते  इस बार बिग बॉस के घर में कुछ ''छंटे छंटाए'' ही सदस्‍य बन पाए हैं। दर्श्‍शक इन छंटे छंटाए लोगों को देखकर सिर पीट रहे हैं। खासकर इन सदस्‍यों की भाषा और व्‍यवहार पर दर्शक शरमिन्‍दा हैं।

बिग बी जैसे बिग बॉस के ये घरवाले आम भारतीय परिवार के सदस्‍य नहीं लगते हैं। इनका व्‍यवहार अगर दर्शक के सिर के ऊपर से निकल जाता है तो इनकी भाषा इनकी खुद की कमर के नीचे टहलती है। और इतना अधिक टहलती है कि बिग बी को सीटी बजानी पड़ जाती है। बिग बॉस के घर से प्रसारित होने वाली अश्‍लील भाषा की इन्‍तहा यह है कि सीटी ही सीटी है पूरे धारावाहिक में। बेचारे बिग बी सीटी बजाते बजाते दुखी हो चुके होंगे अपने घरवालों की भाषा पर। अपनेराम तो इसलिये भी दुखी हैं कि बिग बी सीटी बजाकर भाषा की बेहूदगी तो ढक देते हैं पर व्‍यवहार की अश्‍लीलता और बेहूदगी कैसे ढके। उसे तो अपनेंराम जैसे करोड़ों दर्शकों को झेलना ही है।