शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

ज़मीनों की मारामारी

भक्‍तों, इस घोर कलिकाल में द्वापर घुसने को आतुर है। अपनेराम भय‍भीत हैं कि अब क्‍या होगा। गंगातट पर कुम्‍भ का मेला लगने वाला है। साधुसंतों की रेलमपेल शुरू हो चुकी है। एक तरफ पाण्‍डव साधुवेश में पाण्‍डव हैं और दूसरी ओर अफ़सरों की कौरवी सेना। मामला वही भूमि का है। एक राज्‍य चाहता है और दूसरा फुटों, मीटरों और बीघों में बात कर रहा है। यही क्‍या कम है कि मामला सूई की नोंक से आगे निकल आया है। अब के कौरव भूमि दे तो रहे हैं पर पाण्‍डवों को वह, तब भी कम लगी थी और अब भी कम लग रही है। महाभारत जारी है।

अजब विडम्‍बना है कि किसी वक्‍त सब कुछ त्‍यागने का नाम संतई था पर अब सब कुछ त्‍याग कर फिर से वही सब जुटा लेना संतई की परिभाषा में आता है। सारी दुनिया छोड़कर, अपना घर बार, ज़मीन जायदाद त्‍यागकर भगवा धारण करने वाले ये जो इन दिनों हरिद्वार पहुंच रहें हैं वे सब सरकार से ज़मीनें मांग रहे हैं। ज़मीनें यूं कि उस पर ये लोग अपना धूना रमाएंगे। झण्‍डा गाड़ेंगे, अपना शिविर लगाएंगे। उस सुसज्जित शिविर में आप हम जैसों को बुला बुलाकर कहेंगे कि भाईलोगों अपनी ज़मीनें, अपने घर, अपना मालमत्‍ता यानी कुलमिलाकर सारा माया मोह छोड़ो और  अपने सब कुछ को हमारे चरणों में धर दो तभी मुक्ति मिलेगी, तभी मोक्ष मिलेगा। अपनेराम को मोक्ष की तलाश है ही, झट से इन वंदनीय चरणों में सब कुछ धरने को तैयार हो जाते हैं। लकहनि देते अपनेराम उसी साधु को हैं जिससे राजकाज, व्‍यापार, नौकरी में फ़ायदा हो। ऐसे साधु का दमदार होना, हाई-फ़ाई होना ज़रू‍री है।

ऐसा माना जाता है कि जितनी बड़ी ज़मीन पर जितना बड़ा शिविर होगा और जितनी बड़ी गाड़ी में बैठकर जितने भव्‍य-सुदर्शन स्‍वामी जी जितने बड़े मंच के जितने बड़े सिंहासन पर बिराजकर जितनी बड़ी बड़ी बातें करेंगे उतनी ही जल्‍दी भक्‍त कोउतनी ही प्रभावशाली मुक्ति मिलेगी।

तो कुम्‍भ की शुरुआत में फिलहाल ज़मीनों की मारामारी है। गरीब गृहस्‍थों, उनकी झुग्‍गी-झोंपडि़यों को और उनके पटरी-खोखों को हटाया जा रहा है। भगवाधारियों को दिया जा रहा है। अफ़सर खुश हैं कि वे इस बार पिछले कुम्‍भ की तुलना में संतों को डेढ़ गुना ज्‍यादा भूमि बांट रहे हैं। संत परेशान हैं कि उन्‍हें वांछित भूमि नहीं मिल पा रही है। मिले कैसे, वे डेढ़ सौ एकड़ भूमि चाहते हैं और यह बताने को भी राजी नहीं हैं कि वे इतनी भूमि में जनवरी से अप्रैल तक किस चीज़ की खेती करेंगे। कुम्‍भ आदि मेलों में भक्ति की खेती ही सर्वाधिक फलती है। नवधा भक्ति में भले ज़मीन की चर्चा न की गई हो, पर बिना ज़मीन के कोई भक्ति करे कैसे। सो, संतों को ज़मीनें चाहिये ही। भक्ति के लिये भी ज़मीन चाहिए और मुक्ति के लिये भी ज़मीन चाहिए। भला कोई कहां बैठकर भक्ति करे या करवाए।

कुम्‍भ क्षेत्र में आने वाले साधु-संत भजन-पूजन, यज्ञ-याग, संदेश-उपदेश आदि के लिये सैकड़ों एकड़ों में भूमि चाहते हैं। अफ़सर उन्‍हें ए‍क बटा दस भाग भूमि भी देने को तैयार नहीं हैं। सरकार के पास इतनी  भूमि हरिद्वार में तो है ही नहीं।

अब सरकार गम्‍भीरता से परिवार नियोजन की तर्ज़ पर संत-नियोजन की नीति बनाने पर विचार कर रही है। पर जब इस उर्वर देश में बच्‍चों की पैदावार नहीं रोकी जा सकी तो साधु-संतों, पीरों-फ़कीरों की पैदावार कैसे रुक सकती है। बच्‍चा पैदा करने के लिये तो फिर भी दो की ज़रूरत होती है, चेला तो कोई भी अकेले ही मूंड लेता है।

तो भैये, साधु-संन्‍यासी इन दिनों ज़मीनों में उलझे हैं। जिन्‍हें ज़मीन मिल गई वह बसेरा बनाने की जुगत में है और जिस साधु को बसेरा मिल गया वह जमात जुटाने की जुगाड़ में है। जमात के बाद फिर पद है प्रतिष्‍ठा है, धन है वैभव है। अपनेराम जैसा गृहस्‍थ चकित है। समझ नहीं पा रहा है कि मुक्ति का मार्ग गृहस्‍थों के वैभव के बीच से निकलता है या संन्‍यस्‍तों के वैभव के बीच से निकलता है।

4 टिप्‍पणियां:

Hitesh Parashar ने कहा…

बहुत सुन्दर और मज़ेदार लेख है. बहुत बहुत धन्यवाद लिखने के लिए.

इन संतों को एक ट्रेनिंग दिलवानी चाहिए ताकि ये "सादा जीवन उच्च विचार" का मतलब समझें. इनके घर वालों को भी इनकी खबर लेनी चाहिए कि बेटा जब इस मोह-माया से इतना ही प्रेम था तो घर-बार छोड़ के क्यों भागे.

Dr.Ajeet ने कहा…

गुरुदेव, कुम्भ मे आपसे एक निवेदन है कि यथासम्भव ब्लाग पर नियमित लेखन करे आपके अनुभव और बतकही के माध्यम से इस महाआयोजन को जानना एक अलग किस्म का अनुभव रहेगा...

लगभग दो साल का वर्चुअल निर्वासन झेलने के बाद मै भी पुन: अपने रचनाकर्म मे लौट आया हू आपके आर्शीवाद की अपेक्षा है..

शेष फिर..

डा.अजीत

www.shesh-fir.blogspot.com

suryakant gupta ने कहा…

तुलसी के दोहों में पढ़ा था
"तुलसी संत सुअम्ब तरु फूलि फरहि पर हेत
जितते ये पाहन हनै उतते वे फल देत"
अब के माहौल में क्या कहा जाय
वैसे इनके धन धान्य से परिपूर्ण होने
के बारे में रामचरित मानस के उत्तर कांड में शायद
उल्लेख है.
अच्छा लेख

prapanna ने कहा…

sach hi to aapne sadhuyon kee khabar lee. is se pahle bhi aapkee lekhni ne sadhu santan kee duniya ke yatra karaya tha. behad hi yupyogi hai. khaskar jab haridwar me jab santan ka jamwara ho raha ho. ik taraf envornment saving ke movement chlaye ja rahe hain vahin sadhu samaj ke liye jangal se dhaja ke liye vriksh kaate jane kee khabar aa rahi hai.
jo bhi ho aapkee lekhni se kumbh ka live reporting mil rahi hai.