गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

ठाकरे की ठकुराई

एक छोटे ठाकरे ने एक बड़े ठाकरे की ठकुराई पर अपनी जीत का ग्रहण लगा दिया है। बड़े ठाकरे के अपने लोग, जो उनकी ठकुरसुहाती कहते-करते अघाते नहीं थे, अब न केवल हार का ठीकरा उनके सिर पर फोड़ रहे हैं बल्कि उनके नेतृत्‍व को ठोकर मारने पर भी उतारू दीख रहे हैं। अपनेराम को आनन्‍द आ रहा है कि ठाकरे, ठोकर, ठीकरा, ठाकुर, ठकुराई, और ठकुरसुहाती सारे शब्‍द इन दिनों पंक्तिबद्ध हें। सब एक दूसरे का आसरा सहारा ढूंढ रहे हैं  क्‍योंकि मुम्‍बई के कलानगर बान्‍द्रा में सभी की पोल खुल रही है।

ठाकरे नामक जहाज को डूबता देखकर उसके सवार कूद कूद कर भागने को बेताब हैं। अपने को महाराष्‍ट्र का सिंह कहलवाने वाले की पूंछ इन दिनों तनने से इनकार कर रही है। बेचारी दबी पड़ी है दो टांगों के बीच में।

अब इसे दुर्भाग्‍य की पराकाष्‍ठा न कहें तो क्‍या कहें कि ठाकरे कुल की कुलवधू ही बुरी तरह नाराज़ है अपने बुज़ुर्ग कुलपति से। उसमें जानें कहां से हिम्‍मत आ गई कि वह ''सामना''' वाले का सामना करने के लिये डटकर खड़ी हो गई है। इतनी नाराज़ कि उसने ''शिवसेना कॉलेज''  से अपना नाम कटवाकर ''कांग्रेसी कॉलेज''  में अपना नाम लिखवाने का फैसला कर लिया है। वो तो ''कांग्रेसी कॉलेज'' की प्रिंसिपल सोनिया मैम ने ही ठाकरे-कुलवधू के चरित्र प्रमाणपत्र का गहनता से अध्‍ययन करने के लिए कुलवधू का कांग्रेस-प्रवेश फिलवक्‍त टाल दिया है वरना ''मातुश्री'' के  ''पिताश्री''  तो अब तक कोमा में चले गए होते और इस बारे में चैनल्‍स पर जाने के समाचार भी आ चुके होते। अस्‍तु।

इधर कुलवधू कोपभवन में क्‍या गईं कुल में अफ़रा-तफ़री का माहौल पैदा हो गया है। अपनेराम का मानना है कि इस अफ़रा-तफ़री में भी तफ़री तो विपक्षी ले रहे हैं। शिवसेनावाले तो बेचारे अफ़ारे से ही बेचैन हैं। म.न.से. वाले सर्वाधिक आनन्‍द बड़े मन से ले रहे हैं। उन‍का मन इन दिनों उन्‍मन उन्‍मन है। सारा चमन उनके मन में बस रहा है, खिल रहा है। अपने काका से नाराज़ राजबाबू अब प्रसन्‍न हैं क्‍योंकि उनके काका साहब कुलवधू की करतूत से सन्‍न और खिन्‍न हैं।

मुम्‍बई के मंत्रालय और दिल्‍ली के राजनीतिक गलियारों में भी हवाएं तेज़ बह रही हैं। हवाओं का रुख भांपने वाले नवीन शैली में इंदिरायुग की  पुनरावृत्ति की आस लगाए हैं। उनको लगता है कि तब तो नाराज़ सास ने बहूरानी को दरवाज़ा दिखाया था पर अब ससुर से नाराज़ बहू ख़ुद ही दरवाज़े पर खड़ी है। किसी को आश्‍चर्य भी नहीं होना चाहिए अगर इस बार कुलवधू ही कुलपति को मातुश्री से बेदख़ल करने की कोशिशों पर उतर आए। यह लोकतंत्र है, सब कुछ संभव है। हर तरह की तानाशाही का विरोध इस तंत्र में संभव है। होता आया है, हो रहा है और आगे भी होता रहेगा। कोई तानाशाह, कोई ठाकुर ठाकरे कभी भी ठोकर खाकर गिर सकता है या ठोकर मारकर गिराया जा सकता है। ठीक है न भाई।

2 टिप्‍पणियां:

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee ने कहा…

खूब!

समूह पर समाचारपत्र वाली आपकी सूचना देख अभी पढ़ा|

व्यंग्य तो है ही, `ध्वनि' का भी बढ़िया आनन्द है|

prapanna ने कहा…

yah bhi kya hi maze kee bat hai kee mail me request me jo tarikh hai zara gaur karen ' aaj shanivar 5 december '3009' ko nabhrat times raipur edition me...'
kya yah bhi ik rochak bat nahi hai. yaise vyang to nazar se dekh kar kalam badh kee jati hai so lagta hai bhulvas 2009 ke jagah 3009. sach hi to hai sahitya aur sahityakaar future ko bhi dekh sakta hai. to ik bat to zahir hui kee nabharat times 5 december 3009 me bhi publish ho rahi hogi. is ke sath hi guruvar bhi 'jeevem sharadh: shatam' honge