शुक्रवार, 1 मई 2009

सोनिया के हाथ में कमल

अपनेराम अब इस नतीजे पर पहुंच चुके हैं कि पौत्र -पीढ़ी के सामने अपनी बुद्धि भोथरी होती जारही है। जो ज्ञान तीसरी पीढी दे रही है वह अद्भुत है, अपनेराम की तीसरी पीढ़ी में एक पोती है। उम्र सवा तीन साल। नाम अपरा। स्वभाव जैसे शहद में डूबी हुई तीखी हरी मिर्च का स्वाद। चटपटी से ज्यादा चरपरी और उससे ज्यादा खटमिट्ठी। बोलना शुरू करे तो ऐसा लगे जैसे अंधेरे में अनार फूट रहे हों या चल रही हों फुलझडि़यां। धाराप्रवाह और अनथक वाणी ऐसी कि सातों दिन चैबीसों घण्टे चलनेवाले चैनल थककर उसके आगे पानी भरें।

लगभग हर विषय पर प्रश्‍न पूछना और हर प्रश्‍न का उत्तर देने की कोशिश करना अपरा की सिफत है। आज सुबह अपनेराम ने अचानक अपरा से पूछा, ‘भाई, तुम वोट किसे दोगी?’ उसने प्रतिप्रश्‍न किया, ‘वोट किसे देना है?’ इसपर उसे बताया गया कि मैदान में माया का हाथी है, मुलायम की साइकिल है, कमल का फूल है और सोनिया का हाथ है।

अपरा ने सोचने में एक मिनट से भी कम समय लगाया और तपाक से बोली, ‘आबा, सोनिया गांधी के हाथ में कमल दे दो।’

यह सुनकर अपनेराम भौंचक निहारते रहे नन्हीं अपरा को। उस नन्हीं विचारक का मुख ऐसा लगा मानों घने कुहासे को चीरती हुई कोई किरण उग आई है। एक सौ बीस से ज्यादा कौमी और सात सौ से ज्यादा क्षेत्रीय पार्टियों वाले दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र की त्रासदी उसके यही आंकड़े हैं। संसद के दोनों सदनों की सम्मिलित सीटों से भी ज्यादा जहां राजनीतिक दल हैं, वहां जो लोग शासन चला लेते हैं, उन्हें कार्यकाल पूरा होते ही ‘भारत रत्न’ और ’परमवीर चक्र’ दोनों एक साथ सामूहिक रूप से देना चाहिए। दिल्ली का शासन चलाना मेंढक तोलने से भी ज्यादा कठिन काम है। और यह कठिन काम है हाथ और कमल बरसों से करते आ रहे हैं।

लेकिन उंगलियों को हथेली से जोड़े रखना और मुट्ठी की शक्‍ल देना या फिर कमल की पंखुडि़यों को एक डंठल से जोड़े रखना कितना श्रमसाध्य है, यह कोई सोनिया, मनमोहन या अटल आडवाणी से पूछे। अपने अपने मेंढकों को तराजू के अपने अपने पलड़े में समेटे रखने में देश की सत्तर प्रतिशत सारी ताकत सारी उर्जा, सारी उष्‍मा, और सारे संसाधन, सब कुछ सिर्फ संतुलन बनाने और गालियां, गोलियां बांटने में ही खर्च हो जाते हैं।

कमजोर 30 प्रतिशत राजनेता अपनी ढपली अलग बजा कर 70 प्रतिशत, पर दो जगह बंटे हुए हैं।  परिणामस्वरूप सारा  देश न जाने कब से किसकी कौन सी धुन पर नाच रहा है। आने वाली पीढियों की माने तो  क्या ये बिल्कुल असंभव है कि निजी राजनैतिक विचारधाराओं से उपर उठकर दो बड़े  दल, एक कार्यकाल के लिए ही सही, राजनीतिक सौदेबाजों को अलग करके परस्पर मिलें। देशकल्याण के लिए मिलकर आगे बढें। अपरा की बात सच हो, सोनिया के हाथों में कमल खिलें। मतदान के मामले में ऊंघता हुआ देश कह रहा है- आमीन !! पर ऐसा होना नहीं है वरना अपनेराम यह आलेख व्यंग्य कॉलम में थोड़े ही लिखते !

4 टिप्‍पणियां:

संजय बेंगाणी ने कहा…

बात तो सही कही नन्ही ने.

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

कोशिश तो उनकी ये है कि हाथी पर चढ़ें और साइकिल चाहती है कि उन्हें ही चलाए.

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

कमलकांत जी,
राजनीतिक चर्चा एक तरफ, आपकी उपमा एक तरफ। शहद में डूबी हरी मिर्च, बहुत देर तक स्वाद का अंदाजा लगाता रहा।
बिटिया को शुभाशिर्वाद।

अजित वडनेरकर ने कहा…

अपराताई की राजनीतिक चेतना प्रखर है। भले ही समय से आगे हो:)