हरिद्वारी दोहे
आसमान के गाल पर मलती धरा गुलाल,
धरा गगन दोनों हुए होली खेल निहाल ।।
आसमान खूलकर हंसा, धरती हुई निहाल।
जब धरती के गाल पर नभ ने मला गुलाल।।
सतरंगी चूनर हुई बहुरंगी सब अंग,
हर मन में बजने लगे ढोलक और म़ृदंग ।।
ऐसी भंग छकी है प्रिय ने, सब कुछ है बदरंग,
रसिया बेसुर गा रहे, बेताला है चंग ।।
हरिद्वार के घाट पर ठण्डाई के रंग,
गोरी आंख तरेरती, पिया भंग के संग।।
दो कुण्डलियां
अफ़सर सब नौकर हुए, साधु सत्तासीन।
महाकुम्भ के घाट का यह मनभावन सीन।।
यह मनभावन सीन, सिर्फ ग़मगीन प्रजा है,
गंगातट के वासी को तो कुम्भ सज़ा है।
मित्र पुलिस के अंकुश से सहमी जनता है,
मेले वाले दिन उसकी ना कोई सुनता है।।
तन पर भस्म लपेटकर वे रहते निर्वस्त्र,
काम कामिनी के कहां चलते उन पर अस्त्र।
चलते उन पर अस्त्र, देव उनके त्रिपुरारी,
कुम्भकाल में वे पड़ते हैं सब पर भारी।
इसलिये हरिद्वार में संतों का अब फाग,
सत्ता शासन सब करें, संतों से अनुराग।।
रंगपर्व की इन्द्रधनुषी बधाइयों और मंगलकामनाओं के साथ -
सादर,
डॉ. कमलकान्त बुधकर
एवम् समस्त बुधकर परिवार
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6 टिप्पणियॉं:
सुन्दर दोहे और कुंडलियां। आपको होली मुबारक सपरिवार!
बहुत उम्दा!!
ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
खुशी की हो बौछार,चलो हम होली खेलें.
आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.
-समीर लाल ’समीर’
होली पर आपको, आपकी बेहतर रचना को, दोनों को हार्दिक शुभकामनाएं........www.sansadji.com
बहुत बढ़िया।
काश एक सुझाव पहले दे पाता
तो कुम्भ खत्म होते होते कुम्भ की कुंडलियां या कुम्भ चालीसा सामने आ जाता।
वह तो वैसे भी आ सकता है।
आसमान के गाल पर मलती धरा गुलाल,
धरा गगन दोनों हुए होली खेल निहाल ।।
आसमान खूलकर हंसा, धरती हुई निहाल।
जब धरती के गाल पर नभ ने मला गुलाल।।
क्या प्राकृतिक रंग बिखेरे हैं । और
कुंभ की कुंडलियां भी जोरदार ।
Respected sir holi ki bahoot bahoot shubhkamnayen. Jiase rang aapne apni kavita me bikhere hain vaise hi rango se aapka hridya, apka man avam apki atma saidav aotprot rahe, yahi kamna hai humari. atyant sundar roop se apne rango ko mano sakar kar diya. regads
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