शुक्रवार, 16 जनवरी 2009

हवाओं को मत रोको

जाने कहां गए वो दिन जब अपने देश में सारे देश के नेता पैदा होते थे। कश्‍मीर ये कन्‍याकुमारी तक और अटक से कटक तक कहीं भी कोई पैदा होता था तो पहले भारतवासी होता था फिर किसी प्रांत, भाषा, भूषा या जाति धर्म का होता था। वह जब नेतागिरी करता था तो सिकुड़ी-सिमटी नेतागिरी नहीं करता था। देशभर की सोचता था, देशभर के लिए लड़ताजीता और मरता था। आजकल माहौल बदल गया है। पैदा आजकल भी कम नहीं होते और नेता बनने वालों की नफरी भी पहले से ज्‍यादा ही है। पर आजकल नेता मौहल्‍लों में पैदा होते हैं और वहीं  की राजनीति करते खप जाते हैं। जिनमें थोड़ी बहुत कुव्वत होती है वे नगरपालिकाओं की सीमा से बढ़कर विधानसभाओं की दहलीज़ तक पहुचते हैं और वहीं ढेर हो जाते हैं। कुछेक का हाज़मा तगड़ा होता है वे दिल्‍ली के सपने देखते भी हैं और दिल्‍ली रिटर्न बन भी जाते हैं।

ये यब लिखते लिखते अचानक राजबाबू का ख्‍याल कौंध गया है। अरे वही राजबाबू जिन्‍हें उत्‍तरभारत से बड़ा प्‍यार है। अक्‍सर उत्‍तरभारतीय उनके सपनों में आते हैं और उन्‍हें डराते हैं। डरकर राजबाबू अनापशनाप बोलते हैं और फिर मीडियावाले उनके बोलेअनबोले को ले उड़ते हैं। अचानक राजबाबू अपने शहर में अस्‍थायी-हीरो और देश भर में जीरो बन जाते हैं। दरअसल राजबाबू का शहर ही उनका प्रांत और प्रांत ही उनका देश है। वे आज़ादी के बाद की पैदाइश हैं और आ़ज़ादी का मतलब जानने समझने के लिये भी आज़ाद हैं। वे अक्‍सर भूल जाते हैं कि वे जहां पैदा हुए हैं वहां उनसे पहले राष्‍ट्रवीर शिवाजी, गोखले, तिलक, अम्‍बेडकर, फुले, जैसे राष्‍ट्रचिंतक और ज्ञानेश्‍वर, तुकाराम, एकनाथ, समर्थ रामदास आदि जैसे समाज और धर्मचिंतक भी अवतरित हुए हैं। महाराष्‍ट्र को इन लोगों ने क्‍या दिया यह सोच सोचकर छाती फूलती है और अपने राजबाबू से देश को क्‍या मिल रहा है यह देख देखकर मतली सी होने लगती है।

दोस्‍तों जैसा कि आप जानते ही हैं अपना एक राष्‍ट्र है। उस राष्‍ट्र के भीतर अपना ही एक महाराष्‍ट्र है। उस महाराष्‍ट्र के भीतर दो महाराष्‍ट्र और हैं। एक अन्‍त:महाराष्‍ट्र और एक बृहन्महाराष्ट्र। अन्‍त:महाराष्ट्रियन वे जो महाराष्‍ट्र की सीमाओं में र‍हते और मराठी बोलते हैं। और बृहन्‍महाराष्ट्रियन वे जो मराठीभाषी हैं पर  महाराष्‍ट्र की सीमाओं से बाहर सारे देश और विदेश में भी फैले हुए हैं। करीब दो करोड़ की तादाद में हैं ये लोग। अपनेराम भी उनमें से ही एक हैं। उधर राजबाबू उनके मसीहा बने फिर रहे हैं जो उनके इर्दगिर्द हैं।

अपना दर्द ये है कि अन्‍त:महाराष्‍ट्र वाले राजबाबू जैसे लोग बृहन्‍महाराष्‍ट्र वालों का दर्द नहीं समझते। महाराष्‍ट्र के ये छुटभैये राजनेता अपने वोटबैंक के चक्‍कर में महाराष्‍ट्र से बाहर रहने वाले मराठीभाषियों को भूल बैठे हैं। यही वजह है कि महाराष्‍ट्र से बाहर के मराठीभाषियों ने जब अपना अधिवेशन जब उत्‍तराखंड की राजधानी देहरादून में करना तय किया तो उस पर गोरे राजबाबू की काली छाया पड़ गई। दिसम्‍बर 2009 के अंत में देशभर के मराठीभाषी देहरादून में एकत्र होकर उत्‍तराखंडियों का स्‍वागत सत्‍कार स्‍वीकारने वाले थे पर अपने राजबाबू की मति ऐसी फिरी कि उन्‍होंने देशभर के उन मराठीभाषियों की जान सांसत में डाल दी जो महाराष्‍ट्र  से बाहर रहते हैं और जिन्‍हें बाकी देशवासियों का भरपूर प्‍यार मिलता है। उय प्‍यार में तो कोई कमी राजबाबू के कुछ किये से नहीं आई पर राजबाबू ने दरार डालने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी। अपनेराम का सोचना  यह है कि राजबाबू जैसों के हाथ में अगर सचमुच का राज आ जाए तो फिर अपनेराम तो मुम्‍बई-पुणें की ओर मुंह करके बैठ भी नहीं पाएंगे।

शुक्र है कि अपनेराम राजबाबू की छाया  ये भी दूर हैं। दूर उत्‍तराखंड में अपनेराम का बसेरा है और इसीलिये बृहन्‍महाराष्ट्रियन के तौर पर हैं पर इन दिनों अन्‍त:महाराष्‍ट्र  में प्रवासी हैं। उत्‍तराखंड की कड़कड़ाती ठण्‍ड राहत लेते हुए आजकल पुणे के गुलाबी मौसम का आनन्‍द ले रहे हैं। कल मराठाभूमि सातारा जाना है। देहरादून का स्‍थगित बृहन्‍महाराष्ट्रियनों का अधिवेशन अब सातारा में हो रहा है। राजबाबू की करतूतों का ही यह नतीजा है कि बृहन्‍महाराष्ट्रियनों को सारा देश छोड़कर महाराष्‍ट्र में ही लौटना पड़ा है। अपनेराम के दर्द का यह भी एक कारण है। क्‍या देश अब ऐसे ही नेताओं के कहने पर चलेगा जो देशवासियों को देशवासियों का भी न रहने देंगे। अपने घर के कैदी बनकर जीने में नहीं बल्कि सबके साझे आकाश के नीचे घरौंदा बनाकर साथ साथ जीने का आनन्‍द कौन समझसएगा राजबाबू जैसों को। भाई, अपने घर के खिड़की दरवाज़े बन्‍द करके घुटने में नहीं बल्कि उन्‍हें खुला रखकर हवाओं को मुक्‍त बहने देने में सुख है। यह  सुख समझो जिसे हमारे तुम्‍हारे पुरखों ने समझा और हम खुली हवा में सांस ले सके।  क्‍या ये अधिवेशन ऐसा कुछ कर पाएंगे या ये भी राजनेतओं की कटपुतली भर रह जाएंगे।

 

7 टिप्‍पणियां:

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

राज बाबू राज करने के सपने देखते हैं. ये अलग बात है कि बाबू बनने के लिए जो काबिलियत चाहिए उसे खोजने जायेंगे तो भी खाली हाथ लौटना पड़ेगा. बाँट-बूंट कर ख़तम करने में यकीन करने वाले राज बाबू क्या-क्या करवाएंगे?

मामाजी, अब शर्म किसी शापिंग माल में तो मिलने से रही. ऐसे में बेशर्मी का राज चलता रहेगा.

Vidhu ने कहा…

पर आजकल नेता मौहल्‍लों में पैदा होते हैं और वहीं की राजनीति करते खप जाते हैं। yahi sach hai

रंजना ने कहा…

बिल्कुल सही कहा.........

विष्णु बैरागी ने कहा…

आपकी पोस्‍ट ने 'निठल्‍ला चिन्‍तन' पैदा कर दिया। पहले सेवा भावी नेता होते थे। फिर महत्‍वाकांक्षी नेता होने लगे। फिर अल्‍प महत्‍वाकांक्षी, महत्‍वाकांक्षाविहीन और हीन महत्‍वाकांक्षी। आपने बात छेडी है तो दूर तलक जाए-यही कामना है।

अजित वडनेरकर ने कहा…

कुमति राज के कुकर्मों ने तो वैसे भी मुंबई-पुणे की ओर देखने लायक नहीं रखा है।

makrand ने कहा…

bahut vicharniya thatya

हिमांशु ने कहा…

प्रविष्टि के लिये धन्यवाद.