सोमवार, 17 दिसंबर 2007

मोची महान

कैसे कैसे लोग
वे दिन बहुत याद आते हैं। 1973 का साल। अपनेराम 300 रुपए प्रतिमास पर हरियाणा के जगाधरी शहर में खुले नये नये महाराजा अग्रसेन कॉलेज में अंशकालिक प्राध्‍यापक बने थे हिन्‍दी के। कॉलेज का पहला ही साल था। अपना कोई भवन तो था नहीं। प्रबंध समिति के लाला-लोगों ने कॉलेज की शुरुआत वहां के रामलीला भवन में की थी। अपनेराम एक अन्‍य प्राध्‍यापक के साथ जगाधरी के जुडवाँ शहर यमुनानगर के प्रतिष्ठित एमएलएन कॉलेज के होस्‍टल के एक कमरे में स्‍थान पा गए थे। वहाँ से रोज साइकिल पर सवार होकर खेतों से होते हुए जगाधरी आते जाते थे।
इस कॉलेज को लेकर कई यादें हैं, पर उन्‍हीं दिनों की मानवीय संवेदना से लबालब एक याद अक्‍सर स्‍मृति पटल पर उभर आती है। अपनेराम की नई नई शादी हुई थी। कुछ बाबूजी के और कुछ ससुर जी के दिए हुए पॉंच-चार गरम सूट थे उन दिनों अपनेराम के पास। जिन्‍हें अदल-बदल पहनकर कॉलेज में प्रोफेसर की धज से जाया करते थे। आमदनी तो वही तीन सौ रुपल्‍ली थी जिसमें होस्‍टल का किराया, दोनों वक्‍त का चाय-नाश्‍ता-खाना, कभी कभार साथी प्राध्‍यापकों के साथ होटलबाजी और सिनेमागिरी शामिल थी। इसीमें शामिल था शनिवार का बस से हरिद्वार आना और सोमवार को वापिस जगाधरी पहुंचना। ये सब करके भी उन दिनों बाबूजी से ज्‍यादा पैसे नहीं माँगने पडते थे। काम मजे में चल जाता था।
एक शनिवार उठने में देर हुई तो कॉलेज जाने से पहले के सारे काम जल्‍दी जल्‍दी निबटाने पडे। सूट-बूट पहनकर तैयार हुए और सीधे कॉलेज। कॉलेज में शनिवार को पढाने में मन नहीं लगता था। आखरी पीरियड तो अक्‍सर जल्‍दी निबटाकर अपनेराम सीधे बसड्डे भागते थे हरिद्वार की बस पकडने। हमेशा की यात्रा ने कई ड्राइवरों कण्‍डक्‍टरों से परिचय भी करा दिया था सो वे अपनेराम के लिए सीट का खयाल भी रखते थे। उस दिन भागकर साईकिल नियत स्‍थान पर खडी करके अम्‍बाला-हरिद्वार की बस पकडी । टिकट लेने के लिए जेब में हाथ डाला तो पर्स नदारद । अरे, पर्स तो दूसरे सूट की जेब में रह गया। सर्दियों में आदमी के कपडों में पैसे हों न हों, जेबों की भरमार रहती है। अपनेराम ने सारी जेबे टटोलीं तो सोलह-सत्रह रुपए निकल ही आए। सोचा इतने में तो काम हो ही जाएगा। यमुनानगर से हरिद्वार का किराया उन दिनों 11 रुपए था। मैंने पैसे दिए और टिकट खरीद लिया। सामान के नाम पर एक ब्रीफकेस था, उसे सहेज दिया और ऑंखें मूंद लीं तो नींद सीधे सहारनपुर आकर खुली।
वहां हरियाणा की गाडियां पन्‍द्रह बीस मिनिट रुकती थीं। हमेशा की तरह मैं उतरा। मोची रामभरोसे के पास जाकर जूतों पर पॉलिश करवाई। ये काम मैं हर बार आते जाते करवाता था इसलिए रामभरोसे खूब परिचित हो गया था। उसने हँसकर हालचाल पूछा और जूते चमका दिए। उसे एक रुपया देकर मैंने दो-ढाई रुपए खर्च करके अपनी क्षुधा शांत की। फिर जाने क्‍या सूझा उस दिन कि लॉटरी वाले स्‍टॉल पर जाकर मणिपुर लॉटरी का एक टिकट खरदीदते हुए खुली ऑंखों से थोडे से सपने देख लिए कि अगर ये पॉंच लाख वाली लॉटरी निकल आई तो क्‍या क्‍या करना है।
अभी टिकट लेकर मुडा ही था कि देखा मेरी बस रवाना हो चुकी है। मैं भागा बस के पीछे और बस मेरे आगे आगे। घण्‍टाघर तक पीछा किया बस का पर उसे निकल जाना था और वह चली गई। मैं लॉटरी का टिकट हाथ में लिए 'बस के उठाए गुबार' देखता रहा। फिर लौटा बसड्डे पर। वहां हरियाणा परिवहन वालों का एक काउण्‍टर था जिसपर उनका इंस्‍पेक्‍टर भी बैठता था और टिकट भी मिलते थे। मैंने इंस्‍पेक्‍टर से कहा, 'मेरी बस छूट गई है। मुझे हरिद्वार जाना है।' 'कोई बात नहीं बाबूजी, ये दूसरी बस खडी है, इसमें चले जाओ।' 'ठीक है भैया, पर जरा मेरे टिकट पर लिख तो दो।' मेरी इस बात पर भैयाजी का मूड कुछ और ही था। बोले, 'बाबूजी, इस बस का तो नया टिकट लेना पडेगा। उस बस का टिकट इस में ना चलने का।' 'अरे यार, वह भी हरियाणा की बस थी और ये भी हरियाणे की है। टिकट तो मेरे पास है ही । मेरा सामान भी उसमें चला गया है। अब गलती हो गई है। इस दूसरी बस में अलाऊ कर दे भाई।'
पर भाई को दया नहीं आई। वह सोच रहा होगा, बाबू सूट-बूट में है। नया टिकट ले ही लेगा। और बाबू सोच रहा था कि जेब में डेढ रुपया बचा है यह बात इसे कैसे बताऊँ। इधर उधर टहल कर देखा, दो-चार बसो में भी झॉंका कि कोई परिचित यार दोस्‍त मिल जाए पर उस दिन तो सारे ग्रह-नक्षत्र विरोध में एकत्र थे अपनेराम के। कोई नहीं मिला। तब सहारनपुर शहर में भी ज्‍यादा परिचित नहीं थे कि उनसे रुपये मांग लाता। याद किया तो एक ससुराली रिश्‍तेदार परिवार का ध्‍यान आया। पर वहॉं से ध्‍यान हटाया कि ससुराल में क्‍या इज्‍जत रह जाएगी । पहली बार मिलने जाऊँगा। उन्‍होंने नेग न दिया तो मांगने पडेंगे। क्‍या सोचेंगे वे लोग। नहीं वहां नहीं जाना है।
अचानक खडे खडे मोची रामभरोसे पर निगाह पड गई। मैंने तुरंत निर्णय लिया। हरियाणे के काउण्‍टर वाले इंस्‍पेक्‍टर से कहा, तुम गाडी अभी मत छोडना, मैं दो मिनिट में आया। मैं तुरंत रामभरोसे के पास गया। वह बोला, 'बाबूजी क्‍या बात दुबारार पॉलिश करानी है।' मैं उसे कहना चाहता था कि, 'हॉं, पॉलिश्‍ा तो मेरी वाकई उतर चुकी है और अब तुम्‍हीं कर सकते हो दुबारा।' पर मैंने अपनी घडी उतारकर उसके हाथ में दी और कहा, 'भाई, ये रख ले और मुझे दस रुपए दे दे। परसों लौटते हुए देकर घडी ले लूंगा।' रामभरोसे ने आश्‍चर्य से मेरी ओर देखा। मैंने सारी बात उसे बताई कि आज क्‍या गडबड हुई है तो वह चहक कर बोला, ' अरे बाबूजी, तो इसमें घडी देने की कौनसी बात है। आप घडी भी रखो और पैसे भी ले जाओ। जब चाहे लौटा देना।' उसने मुझे दस रुपए दिए तो मेरे चेहरे की उडी हुई रंगत लौटी। मैं फिर इंस्‍पेक्‍टर के पास पहुंचा और टेबल पर पैसे फेंककर बोला, 'देना एक टिकट हरिद्वार का।'
अपनेराम का मोची से सारा वार्तालाप और रुपए लेना वह देख रहा था। शायद इस भी अपने व्‍यवहार पर शरमिन्‍दगी थी। बोला, 'बाबूजी मोची से पैसे मांगे आपने। यानी सचमुच आपके पास पैसे नहीं थे। लाइये अपना टिकट मैं लिख देता हूं उस पर। आप मोची को पैसे लौटा दीजिये।' गुस्‍सा तो उस पर बहुत आया पर मैंने कहा कि, 'तुम मुझे टिकट दो, मैं अब टिकट खरीदूंगा और मोची के दिए पैसों से ही खरीदूंगा।' पर इस बीच इंस्‍पेक्‍टर की भी शराफत जाग चुकी थी। इसने बस कध्‍डक्‍टर को मुझे पुरानी बस के टिकट पर ले जाने के निर्देश दिए और जबरदस्‍ती बस में बैठा ही दिया। बस जब हरिद्वार के लिए निकल पडी तब मेरे तीन दोस्‍त भागते-दौडते बस में सवार हुए। उन्‍हें देखकर एक बार फिर मेरा गुस्‍सा उबला और मैंने तीनों पर गालियों की बौछार भी कि, 'कम्‍बख्‍तों दस मिनिट पहले नहीं आ सकते थे क्‍या।' लेकिन अगर वे पहले आ जाते तो रामभरोसे मोची के भीतर का महान व्‍यक्तित्‍व मुझे कैसे दीख पाता।

8 टिप्‍पणियां:

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा…

भाई यहाँ तो कहानी हो गई. आपने इसे लिखा ही इस अदा से है कि यहाँ संस्मरण कम कहानी ज़्यादा लगता है. आपने जिस उम्दा तरह से एक अकिंचन मोची की मानवीयता दर्शाई है, उसकी जितनी तारीफ की जाए कम है. बधाई.

ALOK PURANIK ने कहा…

बड़कों-बड़कों में मिले, छोटे छोटे लोग
छोटे छोटों में मिले बडके बड़के लोग
ये जो समाज में मेहनत की कमाई से खाने वाला वर्ग है ना, ये अब भी खासा संवेदनशील है।

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

बहुत बढ़िया संस्मरण....सच में, 'राम भरोसे' ही है सबकुछ.

अजित वडनेरकर ने कहा…

बहुत बढ़िया संस्मरण। रामभरोसे से फिर मुलाकात हुई या नहीं ...

Kamalkant Budhkar ने कहा…

हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया भाई दुर्गाप्रसाद जी, आलोक जी और शिवकुमार मिश्रा जी; आप लोग प्रतिक्रिया देते हैं तो लिखना सार्थक लगता है। प्रिय अजीत, रामभरोसे बाद में मेरे सहारनपुर आने के बाद भी बरसों मिलता रहा। फिर शायद उसने अपना ठीया बदल लिया या ....। प्रभु उस पर कृपा करें।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

कमलकांत जी
आज आप के ब्लॉग पर आया और यहीं का हो कर रह गया. आप के लेखन की सहजता मुझको खूब भा गयी.आप के संस्मरण पढ़ते हुए मुझे भी जगधारी और यमुना नगर की याद आ गयी जहाँ मेरा ननिहाल था. लगभग जब आपने अपना सेवा काल आरंभ किया तभी १९७२ में इंजीनियरिंग की पढाई मैंने भी पूरी की थी.आप की तरह अब जीवन का पूरा आनंद ले रहा हूँ.
कभी मेरे ब्लॉग पर भी तशरीफ़ लाईये. हाँ मेरा आना तो अब लगा ही रहेगा. राम भरोसे जैसे चरित्र और कहाँ मिलेंगे भला... है ना?
नीरज

Dr.Ajeet ने कहा…

मोची महान पढ़ कर ऐसा लगा की अभी भी इस कलिकाल में कुछ महान लोग जिंदा है... आपकी 'बतकही' ने आंखो से समक्ष सीधा बस स्टैंड का द्रश्य खड़ा कर दिया ..अपने अनुभव हम जैसे नवागुन्तको के साथ शेयर करते रहे ताकि आपकी "किताब" हमे होमवर्क में सहायता करें !!
आपका स्नेहाकंशी
अजीत

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

अपने साथ तो कई बार ऐसा हुआ कि जरूरत पर जेब में पर्स गायब मिला। लेकिन कहीं मोची तो कहीं पान वाला काम आया।