शनिवार, 8 दिसंबर 2007

क्‍या कहें सर्दियों को भला

सर्दियों का गीत
 
नौ बजे तक सुबह ना हुई,
पाँच बजते ही दिन ढल चला,
क्‍या कहें सर्दियों को भला ।
 
देर तक सूर्य सोता रहा,
और ऊषा जगाती रही ।
हाथ में कप लिये चाय का,  
चूडियाँ खनखनाती रही ।
पी के फिर सो गया दिलजला,
क्‍या कहें सर्दियों को भला ।
 
बर्फ सी तेज पागल हवा,
स्‍वेटरों की फसल बो गई।
गुनगुनी धूप के वास्‍ते,
इन्‍द्रधनुषी छतें हो गईं ।
जो मिला मफलरों में मिला,
क्‍या कहें सर्दियों को भला ।
 
एक तो यह मुई जनवरी,  
एक मेरा अकेला जिया ।
कॉंपती उंगलियॉं लिख रहीं,
'लौट आ ओ प्रवासी पिया' ।
दूर मत कोई जाए चला,
क्‍या कहें सर्दियों को भला ।
 
नौ बजे तक सुबह ना हुई,
पाँच बजते ही दिन ढल चला,
क्‍या कहें सर्दियों को भला ।

 

7 टिप्‍पणियां:

parul k ने कहा…

एक तो यह मुई जनवरी,
एक मेरा अकेला जिया ।
कॉंपती उंगलियॉं लिख रहीं,
'लौट आ ओ प्रवासी पिया' ।
दूर मत कोई जाए चला,
क्‍या कहें सर्दियों को भला ।
bahut khuub.......

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

सर्दियां आपको कहेंगी
स्वेटर ला, कोट पहन
शॉल ओढ़ा, मफलर लपेट
बिना लाग लपेट, मेवों से भर पेट
रजाई खरीद, ओढ़कर लेट
सो जा। मत सुन सर्दियों की कहानी
करनी पड़ेगी बहानेबाजी
नहीं तो ठिठुरना पड़ेगा
पड़ेगी तापनी ताप
बिना धूप के बहेगी
मुंह से भाप
सुन सर्दी क्या कहती है
वर्दी में सर्दी रहती है।

बाल किशन ने कहा…

प्रणाम.
अच्छी और सरल कविता है. सीधे साफ शब्दों मे पूरी समझ मे भी आती है. सर्दियों का सुंदर और विस्तृत वर्णन.

ALOK PURANIK ने कहा…

और ऊषा जगाती रही ।
हाथ में कप लिये चाय का,
चूडियाँ खनखनाती रही ।
पी के फिर सो गया दिलजला,
क्‍या कहें सर्दियों को भला ।
ये सब क्या हो रहा है.
मामीश्री का नाम तो ऊषा नहीं है, ये फिर कौन आपको सुबह आकर जगा रही है। चाय का कप लेकर चूड़ियां खनखना रही हैं। डेंजर डेंजर रे।
मामीश्री जल्दी वापस आओ।

अनूप शुक्ल ने कहा…

शानदार है कविता गुनगुनी। आलोक पुराणिक की बात करें अनसुनी।

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

सुनसुनी को कैसे करें अनसुनी
बतलाए कोई, जतलाए कोई

पूर्णिमा वर्मन ने कहा…

बहुत बढ़िया कविता बुधकर जी, बधाई